🔔 रहस्यमयी घंटी और तीन दोस्त
एक छोटे-से गाँव में तीन पक्के दोस्त रहते थे—आरव, मोहित और चंदन। तीनों की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे पढ़ाई में ठीक-ठाक थे, लेकिन शरारत में पूरे गाँव में नंबर एक थे।
गाँव के बाहर एक बहुत पुराना स्कूल था। स्कूल कई सालों से बंद पड़ा था। लोग कहते थे कि रात में वहाँ से घंटी बजने की आवाज़ आती है।
एक दिन मोहित ने कहा,
“अगर सच में वहाँ घंटी बजती है, तो आज रात चलकर देखते हैं।”
आरव थोड़ा डर गया।
“और अगर वहाँ भूत हुआ तो?”
चंदन हँसते हुए बोला,
“तो उससे पूछेंगे कि होमवर्क क्यों नहीं करता!”
तीनों हँस पड़े। आखिरकार रात को स्कूल जाने का फैसला हो गया।
रात के करीब दस बजे तीनों टॉर्च लेकर पुराने स्कूल के पास पहुँचे। चारों तरफ सन्नाटा था। अचानक—
टन… टन… टन…!
स्कूल की घंटी बज उठी।
तीनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
“मैंने कहा था न!” आरव फुसफुसाया।
तभी अंदर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
खर्र… खर्र… खर्र…
चंदन ने हिम्मत करके दरवाजा खोला।
दरवाजा चर्रर्र की आवाज़ के साथ खुला।
अंदर अँधेरा था। धूल से भरी मेजें और टूटी कुर्सियाँ पड़ी थीं। अचानक उन्हें एक कमरे से हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।
तीनों धीरे-धीरे उस कमरे की ओर बढ़े।
कमरे में पहुँचते ही उन्हें एक पुराना संदूक दिखाई दिया। संदूक पर लिखा था—
“जिसे खोलोगे, वही राज़ जानोगे!”
मोहित की आँखें चमक उठीं।
“इसे तो खोलना ही पड़ेगा!”
जैसे ही उसने संदूक खोला, उसमें से एक पुरानी कॉपी, एक चाबी और एक नक्शा निकला।
नक्शे पर स्कूल के पीछे बने पुराने कुएँ के पास लाल निशान बना था।
चंदन बोला,
“लगता है खजाना है!”
तीनों दौड़कर कुएँ के पास पहुँचे। नक्शे के अनुसार उन्होंने जमीन खोदनी शुरू की।
कुछ देर बाद—
ठक!
फावड़ा किसी लोहे की चीज़ से टकराया।
तीनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
उन्होंने मिट्टी हटाई तो एक लोहे का डिब्बा निकला।
मोहित ने जल्दी से डिब्बा खोला।
अंदर सोना-चाँदी नहीं था।
अंदर थीं… पुरानी किताबें!
तीनों के चेहरे लटक गए।
“इतनी मेहनत के बाद किताबें?” मोहित ने निराश होकर कहा।
तभी आरव ने एक किताब खोली। उसके पहले पन्ने पर लिखा था—
“ये किताबें उस स्कूल के बच्चों के लिए हैं, जिनके पास पढ़ने के लिए किताबें नहीं थीं।”
तीनों चुप हो गए।
उसी समय पीछे से आवाज़ आई—
“तो आखिर तुम तीनों ने यह राज़ खोज ही लिया!”
तीनों डरकर पीछे मुड़े।
वहाँ गाँव के बूढ़े मास्टरजी खड़े थे।
मास्टरजी मुस्कुराते हुए बोले,
“यह घंटी और किताबें मैंने ही छिपाई थीं। मैं देखना चाहता था कि गाँव के बच्चों में अभी भी दूसरों की मदद करने की इच्छा है या नहीं।”
चंदन ने पूछा,
“लेकिन मास्टरजी, आप रात में घंटी क्यों बजाते थे?”
मास्टरजी हँस पड़े।
“घंटी में मैंने एक रस्सी बाँध रखी थी, जो पीछे वाले पेड़ से जुड़ी थी। हवा चलती थी तो घंटी बज जाती थी!”
तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
मोहित बोला,
“मतलब… इतने दिनों से हम हवा से डर रहे थे?”
मास्टरजी जोर से हँस पड़े।
अगले दिन तीनों दोस्तों ने मिलकर पुराने स्कूल की सफाई शुरू कर दी। गाँव के दूसरे बच्चे भी उनके साथ जुड़ गए। कुछ ही दिनों में बंद पड़ा स्कूल फिर से बच्चों की हँसी से गूँजने लगा।
और उस दिन से गाँव में एक नई घंटी बजने लगी—
डर की नहीं, पढ़ाई और खुशी की घंटी। 🔔
सीख:
सच्चा खजाना सोना-चाँदी नहीं, बल्कि ज्ञान और उसे दूसरों तक पहुँचाने की भावना है।
टिप्पणियाँ (1)
Bahut aacha
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